बाराबंकी में पर्यावरण का विरोधाभास: गांवों से रूठे अपने पक्षी

संवादाता इरफान
बाराबंकी । एक तरफ गांवों-खेतों से धीरे-धीरे गायब होती चिड़ियों की चहचहाहट, तो दूसरी ओर जिले की झीलों में हजारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षियों की चहल-पहल।

बाराबंकी जिले में पर्यावरण बदलाव की यह तस्वीर कई सवाल खड़े कर रही है। यह विरोधाभास साफ तौर पर मानव जीवनशैली, अनियोजित विकास और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण की कहानी बयां करता है।

बाराबंकी में पर्यावरण का विरोधाभास : गांवों से रूठे अपने पक्षी

करीब 40 लाख आबादी वाले बाराबंकी जिले में वन क्षेत्र सिमटकर मात्र 5,308 हेक्टेयर रह गया है। जिले में सर्वाधिक वन क्षेत्र रामसनेहीघाट, फतेहपुर और हैदरगढ़ तहसीलों में दर्ज है।

हालांकि लोक निर्माण विभाग के अनुसार जिले की 1034 किलोमीटर लंबी सड़कों के किनारे पेड़ लगाए गए हैं, लेकिन यह हरियाली स्थानीय पक्षियों के प्राकृतिक आवास को बचाने में नाकाफी साबित हो रही है।

बाराबंकी में पर्यावरण का विरोधाभास : गांवों से रूठे अपने पक्षी

झीलों में जश्न, गांवों में सन्नाटा

जहां गांवों और खेतों में गौरैया, मैना और अन्य स्थानीय पक्षी दुर्लभ होते जा रहे हैं, वहीं जिले की प्रमुख झीलें आज भी विदेशी मेहमानों से गुलजार हैं।

कमरावां, बेलहरा, हरख की लंबौआ, हैदरगढ़ की नरदही और फतेहपुर की भगहर झील हर सर्दी में प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित ठिकाना बनती हैं।

 हजारों किलोमीटर का सफर तय कर आते हैं मेहमान

वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इन वेटलैंड्स में साइबेरियन पिंटेल, शॉवलर, गार्गेनी और बेखुर बतख समेत लगभग 12 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी देखे गए हैं।

दिसंबर से फरवरी तक ये पक्षी यहां डेरा डालते हैं और मौसम अनुकूल होते ही अपने मूल स्थानों की ओर लौट जाते हैं। पर्याप्त भोजन, शांत वातावरण और सुरक्षित जलस्रोत ही इन्हें हर साल बाराबंकी खींच लाते हैं।

बाराबंकी में पर्यावरण का विरोधाभास : गांवों से रूठे अपने पक्षी

स्थानीय पक्षियों पर मंडरा रहा संकट

  • विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय पक्षियों के घटने की बड़ी वजह गांवों में हरियाली का खत्म होना
  • तालाबों व जलस्रोतों का सूखना
  • अंधाधुंध कीटनाशकों का इस्तेमाल
  • सुरक्षित घोंसलों की कमी

बाराबंकी में पर्यावरण का विरोधाभास : गांवों से रूठे अपने पक्षी

बचाव के लिए जरूरी कदम

पर्यावरणविदों के अनुसार स्थानीय पक्षियों को बचाने के लिए गांवों और खेतों में अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगाए जाएं जलस्रोतों का संरक्षण किया जाए कीटनाशक-मुक्त खेती को बढ़ावा मिले घरों व सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित घोंसलों की व्यवस्था हो तभी बाराबंकी में फिर से अपने पक्षियों की चहचहाहट लौट सकेगी। वरना आने वाले समय में गांवों में सन्नाटा और झीलों में ही सिर्फ परिंदों का शोर सुनाई देगा।

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